मृदा : परिभाषा एवं संगठन Soil

 

मृदा : परिभाषा एवं संगठन

 

मृदा की परिभाषा –

“मृदा पृथ्वी की सबसे ऊपर वाली अपक्षयित ठोस पपड़ी की परत है | जो चट्टानों के टूटने व् रासायनिक परिवर्तन से बाने छोटे छोटे कणों और उस पर रहने और प्रयोग करने वाले पादप व जंतु अवशेषों से बनी है|” - रमन {1971}

“मृदा वह प्राकृतिक पिंड है जो विच्छेदित एवं अपक्षयित खनिज पदार्थो तथा कार्बनिक पदार्थो के सड़ने से बने विब्ब्हीं पदार्थो के परिवर्तनशील मिश्रण से प्रोफाइल के रूप में संश्लेषित होती है | यह पृत्वी को एक पतले आवरण के रूप में ढकती है | जल व वायु की उपयुक्त मात्रा मिलने पर पौधो को जीवन प्रदान करती हैं |” – बकमैन और ब्रैडी (1984)

“मृदा एक प्राकृतिक पिंड है जो प्राकृतिक पदार्थो पर प्राकृतिक बलों के लगने से बनी है | प्रायःभिन्न गहराइयों के खनीज तथा कार्बनिक अवयवो के संस्तरो के अनुसार इसके भेद किये जा सकते है | ये संस्तरो अपने से नीचे वाले मूल पदार्थो से आकृति, भौतिक  गुणों बनावट आदि में भिन्नता रखते है |” – जोफे एवं मॅारवट


 


मृदा संगठन -

द्रव्य की तीन अवस्थाओं के समान मृदा में भी ठोस, द्रव और गैस तीन अवस्थाए होती है |

पौधो को पोषण देने की दृष्टि से ठोस व द्रव अवस्थाएं ही आवश्यक है |

मुख्य अवयव – खनिज पदार्थ, कार्बनिक पदार्थ, जल, वायु |

मृदा का आयतनात्मक संगठन -

परिदा में मुख्या चार अवयव महीन दशा में पाए जाते है तथा मृदा आयतन का लगभग 50% भाग ठोस पदार्थ से घिरा होता है |

शेष आयतन को रंध्रावकाश कहते है | जिसमे 25% जल व 25% वायु होती है | जल और वायु के अनुपात में मौसम तथा एनी कारणों से बदलाव होता रहता है |

 

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